अलीगढ़: भारत में इस्लाम की शुरुआत और उसके प्रसार को लेकर आम लोगों के बीच कई सवाल रहते हैं. यह जानना ज़रूरी है कि इस्लाम, तलवार या ज़बरदस्ती से नहीं बल्कि प्रेम, इंसानियत और उच्च नैतिक मूल्यों के ज़रिये फैला. शाही चीफ मुफ्ती ऑफ उत्तर प्रदेश मौलाना चौधरी इफराहीम हुसैन ने इस विषय पर जानकारी देते हुए बताया कि भारत में इस्लाम कैसे पहुंचा और किन कारणों से लोगों ने इसे अपनाया.
भारत में कैसे आया इस्लाम
मुस्लिम धर्मगुरु शाही चीफ मुफ्ती ऑफ उत्तर प्रदेश मौलाना चौधरी इफराहीम हुसैन बताते हैं कि इस्लाम की शुरुआत सातवीं सदी ईस्वी में सऊदी अरब से हुई. पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के माध्यम से इस्लाम का संदेश इंसानियत, एक ईश्वर, न्याय और नैतिक मूल्यों पर आधारित रहा. भारत में इस्लाम का प्रसार मुख्य रूप से अरब व्यापारियों के ज़रिए हुआ.
सातवीं सदी ईस्वी में अरब व्यापारी व्यापार के सिलसिले में भारत आए. इन्हीं व्यापारियों के माध्यम से इस्लाम का परिचय भारत के लोगों से हुआ. केरल में स्थित चेरामन जुमा मस्जिद जो 629 ईस्वी में बनी. भारत में इस्लाम की प्राचीन उपस्थिति का प्रमाण मानी जाती है.
लोगों ने क्यों अपनाया इस्लाम
मौलाना ने कहा कि अरब व्यापारियों का व्यवहार, उनका प्रेम, उच्च आचरण, ईमानदारी, सेवा-भाव और कल्याणकारी सोच लोगों को बहुत प्रभावित करती थी. वे स्थानीय लोगों के साथ सौहार्दपूर्ण संबंध रखते थे. मज़लूमों की मदद करते थे और न्याय व सच्चाई को महत्व देते थे. इन्हीं गुणों को देखकर लोग इस्लाम की शिक्षाओं से आकर्षित हुए और उसे अपनाने लगे.
इस्लाम के प्रसार में सूफी संतों की रही है अहम भूमिका
मौलाना ने कहा कि इसके अलावा भारत में इस्लाम के प्रसार में सूफी संतों की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही. ख़्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती रहमतुल्लाह अलैह, हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया रहमतुल्लाह अलैह जैसे महान सूफी संतों ने इंसानियत, प्रेम, करुणा और आपसी भाईचारे का संदेश दिया.
उन्होंने धर्म के साथ-साथ मानव सेवा को सर्वोच्च स्थान दिया. सूफी संतों की शिक्षा का केंद्र इंसानी हमदर्दी, सेवा, दया, सच्चाई, ईमानदारी और मज़लूमों को इंसाफ दिलाना था. उनके इसी व्यवहार और संदेश से प्रभावित होकर बड़ी संख्या में लोगों ने इस्लाम को स्वीकार किया. इस प्रकार प्रेम, नैतिकता और मानवता के संदेश के माध्यम से भारत में इस्लाम आगे बढ़ता गया.

