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करमपुर स्टेडियम में लकड़ी-ग्रेफाइट स्टिक का महत्व

गाजीपुर में ग्रेफाइट हॉकी निखारेगी हॉकी का भविष्य

गाजीपुर के करमपुर गांव में हॉकी की परंपरा का एक अनोखा संयोजन है. यहां के खिलाड़ी लकड़ी की स्टिक से शुरू करते हैं और धीरे-धीरे ग्रेफाइट हॉकी की ओर बढ़ते हैं. ग्रेफाइट हॉकी की ताकत और करमपुर की परंपरा से यहां के खिलाड़ी बॉल कंट्रोल, ड्रिब्लिंग और पावर में माहिर बनते हैं.

लकड़ी की स्टिक और ग्रेफाइट हॉकी की तुलना में यह सवाल हमेशा उठता है कि लकड़ी की स्टिक बेहतर है या ग्रेफाइट की. परंपरागत लकड़ी की स्टिक से बॉल कंट्रोल और तकनीकी खेल में निखार आता है, जबकि ग्रेफाइट और कार्बन फाइबर की आधुनिक स्टिक से पावर और स्पीड दोनों मिलती है. लकड़ी किफायती और ग्रामीण क्षेत्रों में उपलब्ध रहती है, वहीं ग्रेफाइट महंगी, लेकिन टिकाऊ और अंतरराष्ट्रीय स्तर की आवश्यकताओं के अनुसार है. यही हॉकी का असली आकर्षण है.

कोच करण कुमार के अनुसार, खिलाड़ी को सबसे पहले लकड़ी की स्टिक से खेल की मूल तकनीकें सीखनी चाहिए. लकड़ी से शुरुआत करने वाला खिलाड़ी बॉल कंट्रोल और ड्रिब्लिंग में माहिर बन जाता है. बाद में जब वह ग्रेफाइट हॉकी अपनाता है, तो उसमें पावर और गति दोनों का संतुलन आ जाता है. करमपुर में आज भी बच्चे लकड़ी की स्टिक से शुरू करते हैं और धीरे-धीरे ग्रेफाइट की ओर बढ़ते हैं.

करमपुर का मेघबरन सिंह हॉकी स्टेडियम हॉकी के लिए एक प्रमुख केंद्र है. 1984 में स्व. तेज बहादुर सिंह ने इसे स्थापित किया और पूर्व सांसद राधे मोहन सिंह ने आधुनिक ग्रेफाइट हॉकी स्टिक और बेहतर सुविधाओं का योगदान दिया. करमपुर से ओलंपियन जैसे राजकुमार पाल और ललित उपाध्याय निकले. वर्तमान में यह हॉकी इंडिया मान्यता प्राप्त अकादमी है, जो खिलाड़ियों को उच्च स्तर पर प्रशिक्षण देती है. करमपुर की यह परंपरा और समर्थन हॉकी के विकास में एक मिसाल बन चुकी है. खेल दिवस के मौके पर यह मैदान बच्चों के उत्साह और हॉकी के भविष्य की कहानी दर्शाता है.