Uttar Pradesh

Shahjahanpur News : 1857 की क्रांति का वह योद्धा, जिसके यूरोप तक चर्चे, सात दिनों तक कोतवाली में लटका रहा सिर

Last Updated:June 15, 2025, 23:06 ISTShahjahanpur news in hindi : जब अंग्रेजों ने लखनऊ पर दोबारा नियंत्रण कर लिया, तो वे अपने समर्थकों के साथ शाहजहांपुर पहुंच गए. यहां देखते ही देखते उनके समर्थन में 50 हजार लोगों का सैलाब आ गया है.शाहजहांपुर. शहीदों की धरती शाहजहांपुर ने स्वतंत्रता के संग्राम में अनगिनत वीरों को जन्म दिया, जिन्होंने देश की आजादी के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया. 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के एक ऐसे ही महान नायक थे मौलवी अहमदुल्ला शाह, जिनकी बहादुरी की चर्चा शाहजहांपुर से लेकर पूरे यूरोप तक फैली. मौलवी अहमदुल्ला शाह, जिन्हें प्यार से ‘डंका शाह’ के नाम से जाना जाता था, ब्रिटिश सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती बन गए थे. उनकी लोकप्रियता और प्रभाव का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि अंग्रेजों ने उन्हें जिंदा या मुर्दा पकड़ने के लिए 50,000 रुपये का भारी इनाम घोषित किया था. हालांकि, ब्रिटिश हुकूमत की तमाम कोशिशों के बावजूद वे कभी भी मौलवी को जीवित गिरफ्तार नहीं कर सके.हिल उठी ब्रिटिश हुकूमत 

स्वामी सुकदेवानंद महाविद्यालय के इतिहास विभाग के अध्यक्ष डॉ. विकास खुराना बताते हैं कि मौलवी अहमदुल्ला शाह का जन्म गोपामऊ क्षेत्र में हुआ था, जिसके बाद वे कुछ समय के लिए दक्षिण भारत चले गए थे. 1857 में, जब स्वतंत्रता की ज्वाला पूरे देश में फैल रही थी, अहमदउल्ला शाह शाहजहांपुर लौटे. यहां उन्होंने मुगल बादशाह के बेटे और भतीजे, जनरल बख्त खां के साथ मिलकर आजादी की लड़ाई को और भी तेज कर दिया. जब अंग्रेजों ने लखनऊ पर दोबारा अपना नियंत्रण स्थापित कर लिया, तो मौलवी अहमदुल्ला शाह अपने समर्थकों के साथ शाहजहांपुर पहुंच गए. यहां देखते ही देखते उनके समर्थन में लगभग 50,000 लोगों की एक विशाल भीड़ एकत्र हो गई. मौलवी ने शहर के कैंट इलाके में स्थित जेल को घेर लिया और लगातार नौ दिनों तक उस पर गोलाबारी की, जिससे ब्रिटिश हुकूमत हिल उठी.

फिरंगियों के लिए खौफ

उस समय समाज में यह धारणा भी प्रचलित थी कि मौलवी अहमदुल्ला शाह के पास कुछ जादुई शक्तियां हैं. जब वे हाथी पर सवार होकर निकलते थे, तो उनके आगे एक डंका बजता था. इसी कारण लोग उन्हें ‘डंका शाह’ के नाम से जानने लगे थे. अंग्रेजों के दिल में मौलवी अहमदुल्ला शाह का इतना भय समा गया था कि उनके शाहजहांपुर में रहते हुए ब्रिटिश सेना कभी भी शहर में प्रवेश करने का साहस नहीं कर सकी. जब मौलवी अहमदुल्ला शाह की ताकत कुछ कम हुई, तो वे अंग्रेजों के खिलाफ चल रहे आंदोलन को जारी रखने के लिए पुवायां के राजा के पास मदद मांगने पहुंचे. दुर्भाग्यवश, यहीं पर 15 जून को अंग्रेज अधिकारी डी कांटजो के बहकावे में आकर पुवायां के राजा के भाई बलदेव सिंह ने मौलवी अहमदुल्ला शाह को गोली मार दी. इस वीर सपूत ने मातृभूमि के लिए अपने प्राण त्याग दिए.

मौलवी अहमदुल्ला शाह की शहादत के बाद उनके सिर को काटकर तत्कालीन जिला मजिस्ट्रेट जीपी मनी के सामने पेश किया गया. क्रूर अंग्रेजों ने मौलवी के पराक्रम का अपमान करते हुए उनके सिर को शहर की कोतवाली में सात दिनों तक लटकाए रखने का आदेश दिया, जबकि उनके शरीर का अंतिम संस्कार कर दिया गया. हालांकि, लोदीपुर के कुछ साहसी नौजवानों ने बाद में मौलवी के सिर को कोतवाली से उतारा और पूरे सम्मान के साथ दफनाया.Location :Shahjahanpur,Uttar Pradeshhomeuttar-pradesh1857 की क्रांति का वह योद्धा, जिसके यूरोप तक चर्चे, सात दिनों तक लटका रहा सिर

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