Uttar Pradesh

जानिए अवध में क्या है सुग्गा और मूसर गाड़ने की परंपरा, जिसे न उखाड़ पाने पर दूल्हे पक्ष को दी जाती हैं गालियां

Last Updated:May 10, 2025, 21:36 ISTSultanpur News: उत्तर प्रदेश के अवध क्षेत्र में शादी की अनोखी रस्म “मूसर और सुग्गा” निभाई जाती है. इसमें दूल्हा पक्ष को मूसर उखाड़ने का टास्क दिया जाता है. नाकाम होने पर महिलाएं गालियों के गीत गाकर मनोरंजन करती…और पढ़ेंX

मूसर गाड़ते हुए स्थानीय हाइलाइट्सअवध में शादी की अनोखी रस्म “मूसर और सुग्गा” निभाई जाती है.दूल्हा पक्ष को मूसर उखाड़ने का टास्क दिया जाता है.नाकाम होने पर महिलाएं गालियों के गीत गाकर मनोरंजन करती हैं.सुल्तानपुर: भारत एक ऐसा देश है जहां हर कुछ किलोमीटर पर भाषा, पहनावा, खानपान और परंपराएं बदल जाती हैं. इन्हीं विविध परंपराओं में शादियों से जुड़ी रस्में भी शामिल हैं, जो हर क्षेत्र में अलग-अलग होती हैं. ऐसी ही एक दिलचस्प और अनोखी रस्म निभाई जाती है उत्तर प्रदेश के अवध क्षेत्र में, जिसे “मूसर और सुग्गा रस्म” कहा जाता है. यह रस्म शादी के दौरान काफी मजेदार माहौल बना देती है और इसमें दूल्हा पक्ष को एक अनोखा टास्क पूरा करना होता है.

क्या होता है मूसर और सुग्गा?स्थानीय महिला पुष्पा देवी ने बताया कि मूसर और सुग्गा लकड़ी से बनाए जाते हैं. मूसर लकड़ी का मोटा और मजबूत टुकड़ा होता है, जिसकी लंबाई करीब 2 फीट और मोटाई 3 इंच होती है. वहीं सुग्गा एक लकड़ी की आकृति होती है, जिसे तोते के आकार में बनाया जाता है. इस सुग्गे को मूसर में छेद करके लगाया जाता है. आमतौर पर एक मूसर में 5 या 7 सुग्गे लगाए जाते हैं.

दूल्हा पक्ष के लिए होती है चुनौतीशादी वाले दिन जब दूल्हा मंडप में बैठकर खिचड़ी या कलेवा खाता है, उसी समय यह रस्म निभाई जाती है. मंडप के पास जमीन में पहले से गाड़ा गया मूसर दूल्हा पक्ष के लोगों को उखाडना होता है. यह काम आसान नहीं होता, क्योंकि मूसर को मज़बूती से ज़मीन में गाड़ा गया होता है. अगर दूल्हा पक्ष के लोग इसे सफलतापूर्वक उखाड लें, तो उन्हें तारीफ मिलती है. लेकिन अगर नाकाम रहे, तो शुरू होता है असली तमाशा.

महिलाएं गालियों के गीत गाकर करती हैं मनोरंजनअगर दूल्हा पक्ष मूसर और सुग्गा को नहीं उखाड पाता, तो दुल्हन पक्ष की महिलाएं गाली-गानों के ज़रिए जमकर हंसी-मजाक करती हैं. यह गालियां नाराज़गी नहीं, बल्कि हंसी और मनोरंजन का हिस्सा होती हैं. पूरे माहौल में ठहाके गूंजते हैं और यह रस्म शादी की यादगार पलों में बदल जाती है. बदलते समय के बावजूद अवध के कई गांवों में यह परंपरा आज भी निभाई जाती है. स्थानीय लोग इसे एक सांस्कृतिक धरोहर मानते हैं, जो पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही है. इस रस्म का उद्देश्य सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि दूल्हा पक्ष की परीक्षा लेना और रिश्तों में हंसी-खुशी भरना होता है.
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