कभी ऐसा हुआ है कि लंबी ड्राइव पर हों और अचानक अहसास हो कि पिछला कुछ हिस्सा कैसे पार किया, याद ही नहीं? अगर हां, तो आप अकेले नहीं हैं. ऐसा अनुभव बहुत से लोग करते हैं और इसे आमतौर पर ‘माइंड वांडरिंग’ या ‘ऑटो पायलट मोड’ कहा जाता है. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि जब आप कुछ याद किए बिना ही मुश्किल काम कर लेते हैं, तो वह कैसे होता है? दरअसल, यह सब मुमकिन होता है हमारे दिमाग की ऑटोमेटिक मेमोरी सिस्टम मेमोरी सिस्टम की बदौलत, जो हर दिन बिना रुके हमारे काम को आसान बनाती है.
यह ‘ऑटो पायलट’ मोड हमें बिना ज्यादा सोच-विचार के काम करने में मदद करता है. चाहे गाड़ी चलाना हो, ब्रश करना हो या मोबाइल का लॉक खोलना—इन सबके पीछे दिमाग की वही सिस्टम है, जो एक बार सीखे गए कामों को संदर्भ के अनुसार खुद एक्टिव कर देती है.
कैसे काम करता है ब्रेन का यह ‘ऑटो पायलट’?मनोविज्ञान विशेषज्ञ बताते हैं कि जब हम कोई नया काम सीखते हैं, तो शुरुआत में दिमाग को ज्यादा मेहनत करनी पड़ती है. लेकिन जब वही काम हम बार-बार करते हैं, तो दिमाग उसके पैटर्न को पहचानकर उसे ‘ऑटो मोड’ में डाल देता है. फिर अगली बार जैसे ही वही संदर्भ सामने आता है, दिमाग बिना चेतन प्रयास के वही क्रिया दोहराने लगता है. उदाहरण के लिए, लाल ट्रैफिक लाइट देखकर ब्रेक लगाना. इस सिस्टम को वैज्ञानिक ‘ऑटोमेटिक मेमोरी कंट्रोल’ कहते हैं. यह अनजाने में हमारे व्यवहार को निर्देशित करती है और हमारी डेली एक्टिविटी को सुचारू बनाती है.
इसकी सीमा भी हैहालांकि यह सिस्टम हमें कुशल बनाता है, लेकिन इसकी एक कीमत भी है. हम अक्सर पुराने अनुभवों से जुड़े व्यवहारों को दोहराते रहते हैं, भले ही वे फायदेमंद न हों. यही कारण है कि आदतें बदलना इतना कठिन होता है. विशेषज्ञों के अनुसार, अगर किसी व्यवहार को बदलना है, तो उसके लिए बार-बार नया संदर्भ और अभ्यास जरूरी है. उदाहरण के लिए, यदि किसी विषय पर प्रतिक्रिया हमेशा नेगेटिव होती है, तो उस स्थिति को नए संदर्भ में (जैसे थेरेपिस्ट या विश्वस्त दोस्त के साथ) दोहराने से व्यवहार बदलने में मदद मिल सकती है.
(इनपुट- न्यूज एजेंसी पीटीआई)
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