Uttar Pradesh

बांस से बनता है यह सरताज, बलिया के शादियों की है पहचान, जानें दूल्हे के मऊर और सेहरे का महत्व

बलिया: देश के तमाम राज्यों और इलाकों की अपनी-अपनी मान्यताएं और परंपराएं होती हैं. आज एक ऐसी ही प्राचीन परंपरा की बात करने जा रहे हैं जो आज भी बरकरार है. हम बात कर रहे हैं बलिया में बांस और कागज से तैयार होने वाली एक ऐसी चीज के बारे में जिसके बिना विवाह संस्कार अधूरा माना जाता है. हम बात कर रहे हैं मऊर की जो शादी विवाह का एक अहम हिस्सा है. मऊर का बलिया से गहरा नाता है. शादी-विवाह के सीजन में इसकी काफी डिमांड रहती है. बलिया का हनुमानगंज तो इसके लिए देश-दुनिया में फेमस है.

मउर को जाति-धर्म से नहीं जोड़ा चाहिएप्रख्यात इतिहासकार डॉ शिवकुमार सिंह कौशिकेय ने कहा कि, “शादी-विवाह में लगने वाले मऊर, डाल और सिंहोरा इत्यादि के लिए बलिया जिले का हनुमानगंज प्रख्यात है”. यह सब चीज यहां व्यापक रूप में बनाया जाता है जो पूरे हिंदुस्तान में जाता है. जहां तक मऊर, मौर और मुकुट की बात है तो बहुत अच्छे से जान लेना चाहिए की विवाह-शादी में जितना महत्व दूल्हे का है उतना ही महत्व मऊर का भी होता है. दूसरी चीज इसको किसी जाति धर्मपंथ से भी जोड़कर नहीं देखना चाहिए.

मऊर, मौर और सेहरा में क्या अंतर होता है?यह भारत की संस्कृति है और भारतीय परंपरा है. शादी चाहे हिंदू की हो या मुसलमान की दोनों ही संप्रदायों में इसकी झलक दिखाई देती है. अगर इसे हिंदू पहनता है तो मऊर और मुसलमान पहनता है तो सेहरा कहा जाता है. सेहरा फूलों से तो मऊर कृत्रिम रूप से बांस, कागज और सितारों से बनता है. मऊर के अंदर का तानाबाना लकड़ी का बनता है. मऊर के ऊपर रंगीन कागज चिपकाया जाता है. अब इसमें सितारे और गोटा आदि सामान लगा करके इसे सजाया जाता है.

मऊर के बिना अधूरी रहती है शादीसबसे पहले मऊर को दूल्हे के माथे पर उसकी मां रखती है जिसे “इमली घोटावन” कहा जाता है. इसके बाद वही मऊर यानी मुकुट जाता है जिससे दूल्हे की शादी होती है. यह एक संस्कृति है जिससे बलिया बहुत गहराई के साथ जुड़ा हुआ है. बलिया का हनुमानगंज इसे बनाने का प्रमुख स्थान है. यहां से पूरे देश में मऊर जाता है. आज भी यह परंपरा पूरी तरह से बरकरार है. मऊर के बिन विवाह संस्कार अधूरा माना जाता है.
Tags: Ballia news, Local18FIRST PUBLISHED : December 24, 2024, 22:10 IST

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