05 कैसरबाग में दो गेट हैं, जिन्हें लाखी दरवाजा कहते हैं. 1850 में नवाब वाजिद अली शाह ने दोनों दरवाजे बनवाए थे. एक लाख रुपए का इसमें खर्चा आया था, इसलिए इनका नाम लाखी दरवाजा रखा गया. अंग्रेजों का शासन होने के बाद 13 मार्च 1857 की रात आठ बजे नवाब वाजिद अली शाह इसी गेट से अवध को छोड़ कर गए थे. इस गेट पर जनता अपने ‘जाने आलम को देखने के लिए खड़ी हुई थी. पूरी जनता रो रही थी. जब जनता को गले लगाकर बग्घी पर नवाब वाजिद अली शाह चढ़े थे, तो इसी दरवाजे के नीचे उन्हें ठोकर भी लगी थी. लोगों ने दुआ की थी कि वाजिद अली शाह को दोबारा राजगद्दी मिल जाए, लेकिन इन दरवाजों से होकर गुजरे वाजिद अली शाह को इस शहर का मुंह देखना नसीब दोबारा नहीं हुआ.
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