कहते हैं कि सफलता का मतलब सिर्फ ऊंचे पद और मोटी तनख्वाह नहीं, बल्कि दूसरों के जीवन में लाया गया बदलाव है. गाजियाबाद की प्रियंका राणा इसी परिभाषा को चरितार्थ कर रही हैं. कभी फैशन डिजाइनिंग की दुनिया में ढाई लाख रुपये प्रति माह का शानदार पैकेज लेने वाली प्रियंका ने जब अपनी सुख-सुविधाओं को त्याग कर समाज सेवा का कांटा भरा रास्ता चुना, तो दुनिया हैरान रह गई. आज वे सिर्फ एक नाम नहीं, बल्कि बेसहारा जानवरों की चीख, उत्पीड़ित महिलाओं की ढाल और हजारों भूखों की उम्मीद बन चुकी हैं.
देवबंद से दिल्ली तक का सफर
मूल रूप से शामली की रहने वाली प्रियंका राणा का जन्म 3 जुलाई 1979 को देवबंद में हुआ था. उनके पिता सरकारी डॉक्टर थे जबकि मां गृहिणी थी. मां के साये में बचपन खुशहाल था, लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था. एक सड़क हादसे में पिता के निधन ने परिवार की नींव हिला दी. इसके बाद परिवार दिल्ली आ गया, जहां प्रियंका ने न केवल अपनी पढ़ाई पूरी की बल्कि MBA के बाद फैशन डिजाइनिंग में अपनी एक अलग पहचान बनाई.
करियर का शिखर और मन में बदलाव की कसकअपनी मेहनत के दम पर प्रियंका जल्द ही फैशन इंडस्ट्री का बड़ा नाम बन गईं. वे हर महीने ढाई लाख रुपये कमा रही थीं. लेकिन शादी और बच्चों के बाद, समाज की विसंगतियों ने उन्हें झकझोर दिया. उनके भीतर कुछ बड़ा करने का संकल्प जागा और उन्होंने एक साहसिक फैसला लेते हुए अपने चमकते हुए करियर को अलविदा कह दिया. हालांकि, यह फैसला प्रियंका के लिए आसान नहीं था लेकिन उनके मन में समाज सेवा का संकल्प साफ था.
महिलाओं की ढाल और ‘खुशी फाउंडेशन’ का नेतृत्वजॉब छोड़ने के बाद उन्होंने गरीब और जरूरतमंद लोगों की मदद शुरू की खासतौर पर बेटियों और महिलाओं की. प्रियंका ने महसूस किया कि समाज में महिलाएं आज भी न्याय के लिए भटक रही हैं. ‘खुशी फाउंडेशन’ की सचिव के रूप में उन्होंने घरेलू हिंसा और उत्पीड़न की शिकार महिलाओं को मुफ्त कानूनी सलाह देना शुरू किया. उनका लक्ष्य स्पष्ट है- कोई भी बेटी या महिला सिर्फ पैसों की कमी या डर के कारण न्याय से वंचित न रहे.
बेजुबानों के प्रति संवेदनशीलता, आवारा जानवरों के लिए संघर्ष
प्रियंका का सेवा भाव सिर्फ इंसानों तक सीमित नहीं है. गाजियाबाद और NCR में वे आवारा कुत्तों और अन्य जानवरों के अधिकारों के लिए एक प्रमुख चेहरा हैं. उन्होंने जानवरों के प्रति संवेदनशीलता दिखाते हुए वह स्टेरलाइजेशन और जागरूकता अभियान पिछले कई वर्षों से कर रही हैं ताकि हादसों और बीमारियों पर रोक लगाई जा सके.
कोरोना काल में बनीं ‘अन्नपूर्णा’जब पूरी दुनिया महामारी के डर से घरों में कैद थी, तब प्रियंका राणा सड़कों पर थीं. उन्होंने बिना किसी भेदभाव के लगभग 1.5 लाख जरूरतमंद लोगों तक राशन पहुंचाया. उनका यह निस्वार्थ सेवा भाव आज भी गाजियाबाद के लोगों के जेहन में ताजा है. आज प्रियंका राणा केवल धरातल पर ही नहीं, बल्कि राष्ट्रीय पटल पर भी सक्रिय हैं. वे नेशनल न्यूज चैनलों पर महिला अधिकारों और सामाजिक मुद्दों पर अपनी बेबाक और तर्कपूर्ण राय रखती हैं. उनका मानना है कि यदि एक महिला संकल्प ले ले, तो वह पूरे समाज की तस्वीर बदल सकती है.

